निरूद्ध चित्त ही जीवात्मा के सुख का कारण: डॉ सिंह

गोरखपुर। महाविद्यालय उनवल भिटौली बाजार के रक्षा अध्ययन विभाग के पूर्व आचार्य डॉ बलवान सिंह ने कहा कि चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। यह चित्त हमारे सम्पूर्ण जीवन के क्षण-क्षण के संस्कारों का चित्र लेकर रखता है। यह चित्त जिस विषय से जुड़ता है उसका ज्ञान करा देता है। उसी विषय का संस्कार भी उसमें संगृहीत होता रहता है। यह चित्त हमारे संस्कारों का पुञ्ज होता है। डॉ सिंह ने कहा कि मनुष्य अपने संस्कारों से प्रेरित होकर ही विविध कर्म करता रहता है। यह चित्त हीं मनुष्य के जीवन में सुख दु:ख का कारण भी बनता है इसलिए इसका नियंत्रण या निरोध आवश्यक है। निरुद्ध चित्त ही जीवात्मा के सुख का कारण बनता है। डॉ बलवान सिंह शुक्रवार को श्री गोरखनाथ मन्दिर में आजादी के अमृत महोत्सव के अन्तर्गत अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर साप्?ताहिक योग शिविर एवं शैक्षिक कार्यशाला के तृतीय दिवस के सैद्धान्तिक सत्र में योग का वैज्ञानिक विवेचन विषय पर संगोष्ठी को बतौर मुख्य वक्ता संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि योग विद्या पूर्णत: वैज्ञानिक विद्या है। इस विद्या में स्थूल से सूक्ष्म तक सभी का विस्तृत विवेचन है। उसी तरह अष्टांग योग पूर्णत: वैज्ञानिक प्रक्रिया है। इनका क्रम भी वैज्ञानिक विधि पर आधारित है। हम अपने जीवन में चित्त की वृत्तियों के अनुसार विभिन्न विषयों में आसक्त होते हैं। उन वृत्तियों को यम-नियम आदि अंगों के क्रम से शोधन करके प्रत्याहार, धारणा, ध्यान के द्वारा नियंत्रित करते हुए परमात्म तत्व में स्थिर करते हैं। उसी अवस्था में जीवात्मा को स्वरूप की प्राप्ति या ज्ञान होता है यही योग का विज्ञान है।